डॉ मनमोहन सिंह ; निष्कलंक जीवन आर्थिक सुधारों के जनक

डॉ मनमोहन सिंह राजनीति की उपज नहीं थे। इसलिए उनके योगदान का आकलन राजनीतिक नजरिए से किया जाना मुनासिब नहीं होगा। वे मूलतः अर्थशास्त्री थे। नरसिंह राव सरकार के दौर में वित्त मंत्री की बड़ी जिम्मेदारी इस उम्मीद के साथ उन्हें सौंपी गई थी कि वे गहरे वित्तीय संकट से देश को उबारेंगे। आर्थिक उदारीकरण को लेकर तमाम आलोचनाओं के बीच उन्होंने इस संकट से देश को पार कराया। उनका अपना कोई जनाधार नहीं था। इसके लिए उन्होंने कोई कोशिश भी नहीं की ।

निष्कलंक जीवन


          प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल होने में उनकी इस छवि का बड़ा योगदान था। जिस गांधी परिवार ने उन्हें यह कुर्सी सौंपी , उसे राजनीतिक मोर्चे पर उनसे किसी चुनौती का अंदेशा नहीं था। प्रधानमंत्री के दस साल के अपने कार्यकाल में वे गांधी परिवार के भरोसे पर खरे भी उतरे। प्रधानमंत्री के तौर पर उनके प्रदर्शन के आकलन के समय उनकी सीमाओं को भी ध्यान रखना होगा। उन्होंने दोनों बार गठबंधन सरकारों की अगुवाई की। उनकी यह भी मजबूरी थी कि जिनकी बदौलत वे कुर्सी पर थे , वे उन्हें एक सीमा से अधिक फैसले लेने की छूट देने को तैयार नहीं थे। आर्थिक मामलों में उनकी काबिलियत असंदिग्ध थी। कुछ मंत्रियों के कारण उनकी सरकार को काफी बदनामी झेलनी पड़ी। लेकिन निजी तौर पर डॉक्टर मनमोहन सिंह का कार्यकाल पूरा जीवन निष्कलंक रहा। उनकी निष्ठा -ईमानदारी पर कभी सवाल नहीं उठा। 


राव सरकार में देश को आर्थिक संकट से उबारा

            जून 1991 में देश के पास दो सप्ताह के आयात मूल्य को चुकाने का विदेशी मुद्रा भंडार शेष था। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचते ही नरसिम्हा राव को इस विकट संकट से निपटने के लिए ऐसे वित्त मंत्री की तलाश थी जो वित्तीय प्रबंधन मामलों में अंतरराष्ट्रीय जगत में भरोसेमंद चेहरा हो। राव ने कांग्रेस पार्टी से जुड़े वित्त मंत्री पद के अन्य राजनीतिक दावेदारों को दर किनार किया। आई.जी.पटेल ने इस पेशकश को ठुकरा दिया। उसी रात पी.सी.अलेक्जेंडर ने टेक्नोक्रेट मनमोहन सिंह से संपर्क किया। शपथग्रहण की सुबह नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह से बात की। सिंह ने शर्त रखी कि पद तभी स्वीकार करूंगा , जब मुझे काम में प्रधानमंत्री का पूरा समर्थन मिलेगा। राव ने कहा कि आपको पूरी छूट होगी। अगर नीतियां सफल रहीं तो हम सभी श्रेय लेंगे। असफल रहे तो आपको जाना होगा। राव सरकार पूरे पांच साल चली। मनमोहन सिंह भी इस पूरे दौर मंत्री रहे। आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की जिस नीति पर आगे चल आज देश एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर स्थापित हुआ , उसके जनक मनमोहन सिंह थे।


कांग्रेस के सत्ता से बाहर रहते सोनिया का पाया भरोसा

        नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री के कार्यकाल में जाहिर तौर पर सोनिया गांधी राजनीति में सक्रिय नहीं थीं। लेकिन जल्द ही राव की सोनिया से दूरियों की चर्चा शुरू हो गई। 1996 की पराजय के बाद वे पूरी तौर पर हाशिए पर चले गए। दूसरी तरफ डॉक्टर मनमोहन सिंह में गांधी परिवार के प्रति भरोसा बढ़ता गया। कांग्रेस के सत्ता से बाहर रहते हुए वे गांधी परिवार के काफी नजदीक पहुंच गए। इस नजदीकी ने 2004 में मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचा दिया। कांग्रेस और उसके सहयोगियों की पसंद सोनिया गांधी थीं। लेकिन उन्होंने यह कुर्सी क्यों ठुकराई ,इसकी अलग कथा है। पर उनके पीछे हटने के बाद प्रणव मुखर्जी उम्मीद लगाए हुए थे। सोनिया ने मनमोहन सिंह को आगे किया। क्यों ? यह प्रकट हुआ सरकार बनने और आगे उसके दूसरे कार्यकाल तक के दस साल के सफर में। मनमोहन सिंह बेशक प्रधानमंत्री थे। लेकिन सहयोगी मंत्रियों की टीम उन्हें नहीं तय करनी थी। विभाग भी किसी और को तय करने थे। दावेदार भी उनके पास नहीं बल्कि वहां पहुंच रहे थे , जिनके पास असली ताकत थी। कांग्रेस से जुड़े मंत्रियों को पता था कि उन्हें वफादारी कहां साबित करनी है ? सहयोगी दल जानते थे कि सौदेबाजी किससे करनी है ?

कुर्सी सौंपी लेकिन सोनिया थीं सतर्क

          राव सरकार के अनुभवों से सोनिया गांधी चौकन्नी थी। मनमोहन सिंह की सरकार बनने से छह साल पहले से वे कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। कांग्रेस की एक बार फिर सत्ता में में वापसी का उन्हें श्रेय प्राप्त हुआ। अध्यक्ष के रूप में पार्टी को मजबूत करने की सोनिया की स्वाभाविक जिम्मेदारी और चाहत थी। उन्हें ऐसे प्रधानमंत्री की जरूरत थी जो उनके तय कार्यक्रमों और योजनाओं को अमली जामा पहना सके। प्रधानमंत्री पर यह एक किस्म का परोक्ष नियंत्रण था। इसे संवैधानिक स्वरूप देने के लिए नेशनल एडवाइजरी काउंसिल बनाई गई। सोनिया इसकी अध्यक्ष थीं। सरकार के लिए कार्यक्रम और लक्ष्य तय करना काउंसिल का काम था। मनमोहन सिंह के दोनों कार्यकाल के दौरान यह काउंसिल सलाहकार की भूमिका की जगह कैबिनेट से ऊपर निर्णायक संस्था के तौर पर चर्चा में रही।बेहद शिष्ट, सौम्य और शालीन मनमोहन सिंह अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ कितने स्वतंत्र निर्णय ले सके , यह विवाद का विषय रहा।
अन्ना आंदोलन और राहुल के रुख ने किया परेशान
भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन ने यूपीए -2 की सरकार के लिए काफी मुश्किलें खड़ी कीं। किसी भी सरकार के लिए उसका दूसरा कार्यकाल और उसका भी आखिरी हिस्सा काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इस समय तक जनता का धैर्य जवाब देने लगता है। अन्ना आंदोलन ने असंतोष की आंच और तेज की। खुद मनमोहन सिंह की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं था लेकिन जिस सरकार की वे अगुवाई कर रहे थे , वो आरोपों से घिरी हुई थी। सवाल सिर्फ मंत्रियों पर उनके कमजोर नियंत्रण का नहीं था। ज्यादा जोर इस बात पर था कि वे संविधानेतर सत्ता से नियंत्रित हैं। इस दौरान विरोधियों से भी ज्यादा बड़ी चोट उन्हें राहुल गांधी से मिली। तब मनमोहन सिंह विदेश में थे। दागी नेताओं को बचाने वाले कैबिनेट से मंजूर एक अध्यादेश को राहुल ने सार्वजनिक तौर पर फाड़ कर प्रधानमंत्री को खुली चुनौती दे दी। उम्मीद की जा रही थी कि इसके बाद मनमोहन सिंह इस्तीफा दे देंगे। लेकिन उन्होंने अपमान के इस घूंट को भी पी लिया।
हर जिम्मेदारी पूरे समर्पण से निभाई
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना, खाद्यान्न सुरक्षा, शिक्षा, सूचना के अधिकार, आधार , कृषि ऋण माफी जैसी अनेक योजनाएं और अमेरिका से असैन्य परमाणु समझौते जैसी उपलब्धियां मनमोहन सिंह के सरकार के हिस्से में आईं। उनका निजी जीवन गौरवशाली उपलब्धियों से भरा रहा। अर्थशास्त्र के वे अंतरराष्ट्रीय जगत की ख्यात हस्ती थे। रिजर्व बैंक के गवर्नर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष की बड़ी जिम्मेदारी भी उन्होंने बखूबी निभाई। वे इस लिए भी याद किए जाएंगे कि हर दायित्व के प्रति वे समर्पित भाव से कार्यरत रहे। उनका लम्बा जीवन निष्कलंक और निर्विवाद रहा। प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी निष्ठा,समर्पण और अपना सर्वोत्तम देने के उनके प्रयासों पर भी कभी सवाल नहीं उठे। फिर भी ऐसे मौके जब उन्हें बोलना चाहिए था या कोई कड़ा फैसला लेना था, वे क्यों खामोश रहे या पिछड़े , इसका जवाब मनमोहन सिंह के पास ही था ? शायद उन्होंने अपने संस्मरण संजोए हों और वे अब उनके जाने के बाद कभी सामने आएं। प्रधानमंत्री के कार्यकाल के आखिरी दिनों में किसी मौके पर उन्होंने एक शेर पढ़ा था। वो उनके शांत - सौम्य स्वभाव और व्यक्तित्व की अतल गहराई की झलक देता है, कई जवाबों से अच्छी खामोशी मेरी
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